अशोक जी के विषय में

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जुझारू स्वयंसेवक, तपोनिष्ठ कार्यकर्ता और विश्वभर में हिन्दुत्व की रक्षा के लिए सफल अभियान चलाने वाले हिन्दू हृदय सम्राट अशोक सिंहल जी देश के हर एक नागरिक के मन में बसे हुए हैं। समाज और देश की भलाई के लिए अपने जीवन के बेशकीमती आठ दशक समर्पित करने वाले अशोक जी का व्यक्तित्व सबके लिए वंदनीय एवं अनुकरणीय है।

जन्म

भारत माता के सच्चे सपूत अशोक सिंहल जी का जन्म आश्विन कृष्ण पंचमी सम्वत् सन् 1983 विक्रमी और अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 27 सितम्बर 1926 को आगरा में उनके ननिहाल में हुआ था। उनके पिता का नाम महावीर सिंह जी और माँ का नाम श्रीमती विद्यावती था। अशोक जी के पिता अलीगढ़ जिले के बिजोली गांव के रहने वाले थे। उनका परिवार उस समय के संपन्न परिवारों में गिना जाता था। उस समय की दसवीं पास माँ विद्यावती बालक अशोक जी की पहली गुरु थीं। उनकी माँ खुद आध्यात्मिक और धार्मिक प्रवृत्ति की थीं इस कारण से घर में साधु-सन्यासियों व आध्यात्मिक वृत्ति के लोगों का आना-जाना लगा रहता था।

पारिवारिक पृष्ठभूमि

अशोक जी के पिता महावीर सिंह डिप्टी कलेक्टर थे, जिस कारण उनका परिवार संपन्न था। उनके नाना जी भी शहर के बड़े जम्मींदार थे। अशोक जी सात भाई थे, जिनकी एक ही बहन थीं उशा 'दीदी'। उनका विवाह 1963 में हुआ था। अशोक जी के छोटे भाई थे भारतेन्दु सिंहल। जिनका विवाह 1950 में ही हो गया था। अशोक जी के छोटे भाई ने आईपीएस की परीक्षा पास की थी और वह उत्तर प्रदेश पुलिस के डायरेक्टर जनरल भी रहे। उनसे छोटे भाई थे, पीयूष सिंहल और विवेक सिंहल। इन दोनों भाइयों ने उद्योग क्षेत्र को ही अपना कर्मक्षेत्र बनाया। उन दोनों का विवाह 1964-1965 में संपन्न हुआ। आध्यात्मिक माहौल होने के कारण माता ने अपने बच्चों को वैसे ही संस्कार दिए। जिसका परिणा यह हुआ कि इन्हीं के चलते उनकी संताने जीवन के हर क्षेत्र में सफल होती गयी।

शिक्षा-दीक्षा

अशोक जी के भाइयों में उनका क्रम चौथा था। वे आध्यात्मिक वृत्ति के थे, उन्हें संगीत से विशेष प्रेम था और उनका स्वर भी सुंदर था तथा संघ के कई गीतों में उन्होंने अपना स्वर दिया है। 1950 ई0 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से धातुकर्म में उन्होंने अभियंता की उपाधि प्राप्त की थी। विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में वे ज्यादातर समय आध्यात्मिक साहित्य के अध्ययन में व्यतीत करते थे। उनकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई में रुचि शुरू से ही नहीं थी। हालांकि पिताजी के कहने के कारण वह काशी गए और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। वह शुरु से ही ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए राष्ट्रसेवा में लगे रहना चाहते थे। अशोक जी बचपन के दिनों में पढ़ने के साथ-साथ संघ की शाखा में भी जाया करते थे और समय मिलते ही एकांत में चिंतन करना उन्हें बहुत प्रिय था।

कार्यक्षेत्र/सामाजिक संलग्नता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक समर्पित कार्यकर्ता के रूप में अशोक जी कानपुर महानगर में प्रचारक की जिम्मेदारी संभाली। इस दौरान वह कई सालों तक कानपुर, प्रयागराज आदि जिलों में संघ का दायित्व निर्वाह करते हुए आगे बढ़ते गए। जिसके बाद अशोक जी को दिल्ली प्रांत और हरियाणा प्रांत का संघचालक नियुक्त किया गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक पूज्य गुरुजी ने उनकी प्रतिभा और मनोभाव को पहचाना और उन्हें विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से हिन्दू समाज के कल्याण और उत्थान के कार्य के लिए प्रेरित किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि अशोक जी शुरुआत में विहिप के संयुक्त महामंत्री और महामंत्री समेत अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष तक बने और जीवन के आखिरी समय तक विहिप के संरक्षक रहे। उन्होंने विहिप की पहचान एक जनआंदोलन के रूप में कराई। साथ ही बजरंग दल, युवा वाहिनी आदि अन्य संगठनों को जोड़कर विहिप के कार्यक्षेत्र को बढ़ाने का काम किया। देशभर में रामजन्मभूमि आंदोलन छेड़कर अशोक जी ने राममंदिर निर्माण की रूपरेखा तैयार की।

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