विचार धारा

विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अध्यक्ष और हिन्दू हृदय सम्राट अशोक जी ने हिन्दू समाज को लेकर फैले इस भ्रम को तोड़ा कि हिन्दू संगठित नहीं हो सकते। समाज जीवन के प्रतिकूल परिवेश और कई खतरों को उठाकर हिन्दू नवोन्मेष के नए-नए प्रयोग की पहल करने की क्षमता के अलावा उचित सहयोगियों का चुनाव और अलग-अलग स्वभाव वाले कार्यकर्ताओ को संगठित कर आगे बढ़ने क्षमता, उनके नेतृत्व की कुशलता का ही परिणाम है। उन्होंने कई राजनीतिक सामाजिक एवं आर्थिक बाधाओं और रुकावटों के बावजूद अपनी दृढ़ संकल्प-शक्ति के बल पर इस संगठन को खड़ा किया।

चारों वेदों और दर्शनों के सार को हृदय में समाने करने और उसे अपने आचरण में ढ़ालने की वजह से ही अशोक सिंहल जी का व्यक्तित्व हिमालय जैसा ऊंचा हो सका। निरन्तर संघ साधना और तपस्या की वजह से उनका जीवन दिव्य और अनुकरणीय बना। स्वामी विवेकानंद, डॉ. हेडगेवार और श्रीगुरुजी के बाद वर्तमान समय में अशोक जी हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार का श्रेय दिया जाता है। उनके द्वारा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए किया गया शंखनाद सभी मठाधीशों और धर्मगुरुओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना। जीवन के 91वें वसंत में प्रवेश के बाद भी हिंदुत्व का मार्गदर्शन करने के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यों में भी उनकी सक्रियता बनी रही। उन्होंने अपने देश में और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दू हितों के लिए समय-समय पर केन्द्र सरकार के साथ-साथ विभिन्न राज्य सरकारों और विश्व नेतृत्व को चुनौती दी और अपनी बात रखी।

अशोक जी का संकल्प

अशोक जी के स्वाभाव को एक श्रेष्ठ आध्यात्मि, धार्मिक और सांस्कृतिक व्यक्तित्व के रूप में जाना जाता है। उनका एकमात्र संकल्प और उद्देश्य भारतीय संस्कृति और परंपरा की रक्षा करना रहा। यही नहीं उन्होंने जिस अभियान को पूरा करने का संकल्प लिया, उसे सफल भी करवाया। उन्होंने गौ, गंगा और वेदों की रक्षा के अलावा अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन, धर्मान्तरण के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन और रामसेतु को बचाने का असीम संकल्प लिया और उसे क्रियान्वित भी कर दिखाया। उनके द्वारा किए गए इन कार्यों का कोई मोल नहीं।

  • fl-1.jpg
  • fl-2.jpg
  • fl-3.jpg
  • fl-4.jpg
  • fl-5.jpg
  • fl-6.jpg
  • fl-7.jpg